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मनोरोग को सामाजिक कलंक मानते हैं 47 प्रतिशत भारतीय

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मनोरोग को सामाजिक कलंक मानते हैं 47 प्रतिशत भारतीय

भारत में मानसिक बीमारी को 47 प्रतिशत लोग सामाजिक कलंक मानते हैं, जबकि 87 प्रतिशत लोग इसे गंभीर बीमारियों और उनके लक्षणों जैसे शिजोफ्रेनिया एवं ऑब्सेसिव कम्पल्सिव डिस्ऑर्डर से जोड़ते हैं. 47 प्रतिशत लोग मानसिक रोगियों के बारे में मनचाही धारणा बना लेते हैं. ये लोग मानसिक बीमारी वाले लोगों के साथ सहानुभूति तो रखते हैं, लेकिन वे इनसे एक सुरक्षित दूरी भी रखना चाहते हैं. ऐसे लोग मुंबई, हैदराबाद और कोलकाता में अधिक देखे गए. दरअसल, दिमागी सेहत के बारे में लोगों की आम धारणा को मापने के लिए द लिव लव लाफ फाउंडेशन द्वारा जारी की गई एक रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक, 26 प्रतिशत लोग मानसिक बीमारी वाले लोगों से डरे हुए रहते हैं. वे न तो किसी मानसिक रोगी के निकट रहना चाहते हैं और न ही उनसे बातचीत करते हैं। बंग्लुरू और पुणे शहर के लोगों में ऐसी सोच ज्यादा देखने को मिली है. 27 प्रतिशत लोग मानसिक बीमारी वाले लोगों के प्रति समर्थन जताते हैं. वे भेदभाव नहीं करते और इस पर यकीन रखते हैं कि कोई भी व्यक्ति मानसिक रोग से ग्रसित हो सकता है. कानपुर, पटना और दिल्ली जैसे शहरों में यह अधिक देखने को मिला.

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