content-cover-image

ग़रीबी ना देखिये साहब....जज़्बे की क़दर करिये...

मुख्य खबरें

00:00

ट्रेंडिंग रेडियो

ग़रीबी ना देखिये साहब....जज़्बे की क़दर करिये...

देश में रिक्शे बहुत हो गए हैं । ये टिव्टर पर लेखिका,सामाजिक कार्यकर्ता और सोशल मीडिया पर एक्टिव रहने वाली शोभा डे ने लिखा। ये बात उन्होंने हेप्टाथलन में स्वर्ण पदक जीतने वाली पश्चिम बंगाल की स्वप्ना बर्मन के लिए कहीं क्योंकि वो एक रिक्शा चालक की बेटी हैं और उनकी मां चाय बगान में मजदूर हैं । भारत के एथलीट अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में पदक नहीं जीतते इसके कई कारण बताए जाते हैं । मसलन अच्छे कोच का नहीं होना,उनकी कमजोर खुराक और अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में मौके नहीं मिलना ।बेशक ये जरूरी होते हैं पदक जीतने के लिए लेकिन इनके साथ जो सबसे जरूरी होता है खिलाडी का जज्बा । स्वप्ना ऐसे ही जज्बे की मिसाल हैं । उनके दोनो पैर में 6 ,6 उंगलियां हैं ,जिससे उन्हें जूते पहनने में दिक्कत आती है । वो इतनी बडी स्टार भी नहीं कि जूता कंपनी उनके लिए अलग से जूते बनाए । तमाम दिक्कतों के बावजूद उन्होंने ऐसे स्पर्धा में पदक जीता जिसमें सात इवेंट होते हैं । दौड़,लंबी कूद के अलावा बालू पर चलना । स्वप्ना ने सभी इवेंट में अपने विरोधियों को पीछे छोडा और सोने के पदक पर कब्जा किया लेकिन उनके पदक के साथ ही उनकी गरीबी का भी सोशल साइट पर मजाक बनाया गया । किसी भी विकसित समाज के लिए गरीबी अभिशाप है और यही अभिशाप स्वप्ना को भी घेरे रहा लेकिन किसी भी सभ्य समाज से ये अपेक्षा भी नहीं की जाती कि वो गरीबी का इस तरह से मजाक उडाए । खासकर उनलोगों से तो बिल्कुल भी नहीं जो लेखक होने और संवेदनशील होने का दावा करते हैं । शोभा डे पर भी ये बात लागू होती है । श्रीमती शोभा डे ने गरीबी नहीं देखी,अपने बच्चों को भूख से बिलखते भी नहीं देखा । वो अपने दस बच्चों को पूरे शान और शौकत के साथ पाल सकती हैं, या पाला है । अगर आप किसी की उपलब्धि की तारीफ नहीं कर सकते तो उनका मजाक उडाने का हक भी नहीं आपको।सोशल मीडिया का एक प्रचलित शब्द है ,ट्रोल होना । मतलब आलोचना, विरोध या मजाक । शोभा डे भी इस वाक्ये के बाद ट्रोल हुईं लेकिन क्या इतना काफी था? ऐसे भद्दे मजाक की क्या निंदा नहीं की जानी चाहिए थी । दो सिल्वर मेडल जीतने वाली उडीसा की दुती चंद का जिक्र भी जरूरी है । शरीर में मेल हार्मोंस ज्यादा हो जाने के कारण एक बार तो उन्हें महिला मानने से ही इंकार कर दिया गया था । लेकिन बाद में उन्हें महिला माना गया और अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में भाग लेने की अनुमति मिली । उनका परिवार भी काफी गरीब है । उनको तो प्रैक्टिस के लिए स्टेडियम भी नसीब नहीं होता था, वो खेतों में दौडा करती थीं । उन्होंने 100 और 200 मीटर की दौड़ में रजत पदक जीता तो उडीसा सरकार ने उनके लिए हर पदक डेढ़ करोड रूपए देने का ऐलान किया । अब उनकी गरीबी दूर होगी और प्रेैक्टिस के लिए समय और पैसे की कमी नहीं होगी । दरअसल जकार्ता में रविवार को ही खत्म हुए 18वें एशियाई खेलों में उन लोगों का जिक्र जरूरी था जो बडे नाम तो नहीं थे लेकिन अपने प्रदर्शन ने उन्होंने पूरे देश को चौंका दिया । इनमें यूपी के मेरठ के सौरभ चौधरी और शार्दुल विहान का जिक्र जरूरी है । दोनों साधारण परिवार से आते हैं लेकिन खेल चुना जो खासा महंगा है । दोनों ने शूटिंग को चुना और अपपे पहले ही प्रयास में स्वर्ण और रजत पदक जीता । टीम में कई नामी खिलाडी मौजूद थे । लेकिन सभी ने निराश किया । जकार्ता में भारत ने अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन किया । 1951 के पहले एशियाई खे में भारत ने 15 गोल्ड मेडल जीते थे । इस बार उसकी बराबरी की और कुल मेडल की संख्या को 69 तक पहुंचा दिया ।

Show more
content-cover-image
ग़रीबी ना देखिये साहब....जज़्बे की क़दर करिये...मुख्य खबरें