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समलैंगिकता के बाद अब इन केसों पर रहेगी नजर

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समलैंगिकता के बाद अब इन केसों पर रहेगी नजर

सुप्रीम कोर्ट का गुरुवार को आए ऐतिहासिक फैसले के बाद भारत में दो वयस्क लोगों के बीच सहमति से बनाए गए समलैंगिक संबंध अब अपराध नहीं रहे। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली शीर्ष अदालत की संवैधानिक पीठ ने यह फैसला सुनाया है। चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा 2 अक्टूबर को रिटायर होने जा रहे हैं। उनके कार्यकाल में अब क़रीब 20 वर्किंग डे बचे हैं और उनके सामने कई ऐसे मामले हैं जो देश की तस्‍वीर बदलने का दम रखते हैं। चीफ़ जस्टिस की अगुवाई वाली बेंच के सामने आधार कार्ड का भविष्य भी तय होगा। इसके अलावा जल्द ही सहमति से किसी विवाहित महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाना व्यभिचार नहीं माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से हटाने के स्पष्ट संकेत दिए। व्यभिचार महज तलाक का एक आधार रहेगा। पांच जजों का संविधान पीठ तय करेगा कि ये धारा अंसवैधानिक है या नहीं, क्योंकि इसमें सिर्फ पुरुषों को आरोपी बनाया जाता है महिलाओं को नहीं। हालांकि जिस फैसले पर सबसे ज्‍यादा नजर होगी वह है राम मंदिर की जमीन के मालिकाना हक का मामला। सुप्रीम कोर्ट इस बात का निर्णय करेगी कि क्या 1994 के एम इस्मायल फ़ारुक़ी बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया में पांच जजों की संवैधानिक पीठ के आदेश को दोबारा परखेगी या नहीं। 20 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने इस पर फैसला सुरक्षित रखा था. सुप्रीम कोर्ट राम मंदिर टाइटल सूट से पहले अब इस पहलू पर दोबारा सुनवाई कर रहा है कि मस्जिद में नमाज पढना इस्लाम का अभिन्न हिस्सा है या नहीं। कोर्ट ने ये कहा था पहले ये तय होगा कि संविधान पीठ के 1994 के उस फैसले पर फिर से विचार करने की जरूरत है या नहीं कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का इंट्रीगल पार्ट नहीं है। 1994 में पांच जजों के पीठ ने राम जन्मभूमि में यथास्थिति बरकरार रखने का निर्देश दिया था। केरल के सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर लगी उम्र संबंधी पाबंदियों पर भी सवाल उठाए गए हैं।अगस्त में सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी के खिलाफ याचिका पर संविधान पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए पूछा महिलाओं को उम्र के हिसाब प्रवेश देना संविधान के मुताबिक है?

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