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Khabri Special: राफेल डील- जानिये सब कुछ

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Khabri Special: राफेल डील- जानिये सब कुछ

राफेल डील आजकल देश दुनिया में चर्चा का विषय है. इसी मामले में खबरि से विनोद कपूर जी की एक ख़ास रिपोर्ट। सालों पहले बोफोर्स तोप,सुखोई विमान ,अगस्टा वेस्टलैंड हेलीकाप्टर और अब राफेल लडाकू विमान की खरीद के मामले में भारत में तूफान मचा है । पहले के तीन रक्षा सौदों में दलाली या कमीशन की चर्चा हुई थी तो ये पहली बार है कि राफेल में दलाली नहीं बल्कि किसी खास को फायदा पहुंचाने के लिए फेवर की चर्चा हो रही है ।फ्रांस की दसॉल्ट एविएशन से भारत ने 36 राफेल विमान खरीद का सौदा किया है । दरअसल से डील दो सरकारों के बीच नहीं बल्कि दो कंपनियों के बीच है इसलिए फेवर के आरोप लगाए जा रहे हैं । विपक्ष और सरकार की ओर से आरोप प्रत्यारोप का दौर थमता दिखाई नहीं दे रहा है। विपक्ष खासकर कांग्रेस और उसके अध्यक्ष राहुल गांधी सरकार पर खासे आक्रामक बने हुए हैं । सरकार ने साफ किया है कि रिलायंस और फ्रांस की कंपनी दसॉल्ट एविएशन के बीच हुए करार में उसकी कोई भूमिका नहीं है ।खुद फ्रांस सरकार और दसॉल्ट एविएशन ने ये बात कही है । अगर इसी को भ्रष्टाचार कहा जाय तो दसॉल्ट का रिलायंस के साथ करार 2007 में हुआ था । तब केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए 1 की सरकार थी और अंबानी बंधु अगल नहीं हुए थे । अगल होने के बाद बडे भाई मुकेश ने रक्षा और बीमा जैसे व्यापार से खुद को अलग कर लिया और ये काम अनिल अंबानी के पास आ गया । ऐसी स्थिति में क्या यह कहा जा सकता है कि दोनो कंपनी की डील में भ्रष्टाचार हुआ था । रक्षा सौदे में गोपनीयता की शर्त यूपीए के कार्यकाल में ही रखी गई थी जिसके बारे में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में कागजात पेश किये थे । फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद का पहले ये कहना कि दसॉल्ट के सामने भारत सरकार ने रिलायंस का नाम पेश किया था और बाद में उससे मुकर जाना तस्वीर को और उलझाता है । फ्रांस सरकार भी अब कह रही है कि ओलांद का गैरजरूरी बयान दोनो देशों के रिश्तों को खराब कर सकता है । मतलब दोनो सरकारे ये मान रही हैं कि इस सौदे में सरकारों की कोई भूमिका नहीं है । सौदे से जुड़े खुलासे और लग रहे आरोप प्रत्यारोप न सिर्फ गैरजरूरी हैं बल्कि असली मुद्दे से ध्यान भी भ्रटकाते हैं । कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का पीएम नरेंद्र मोदी को चोर चौकीदार कहना या बीजेपी के मंत्रियों का राहुल को मूर्ख राजकुमार बताना अशोभनीय और अवांछनीय है । ऐसी बात व्यक्ति के साथ पार्टी की गरिमा भी गिराते हैं । राजनीति में आरोप प्रत्यारोप का निजी हमलों के बदल जाना वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है । विपक्ष को सरकार से सवाल पूछने का पूरा हक है और उस सच को जनता को बताना उसकी जिम्मेवारी भी लेकिन राष्ट्रीय हितों के सवाल पर बिना ठोस सबूत के आरोप लगाने से बचा जाना चाहिये । लेकिन इस मामले में केंद्र सरकार भी बहुत संयत नजर नहीं आई है । उसने भी आरोपों का सिर्फ जवाब ही दिया है और आरोप लगाने वालों पर निजी हमले किये हैं । सरकार से अपेक्षा थी कि वो गोपनीयता का पूरा ख्याल रखते हुए जो कुछ भी सच है उसे जनता के सामने रखे । उसे कतराना नहीं चाहिए । सिर्फ आरोपों का जवाब देने से काम नहीं चलने वाला । क्योंकि आरोप प्रत्यारोप के बीच कुछ ऐसी बात भी सामने आई है तो नरेंद्र मोदी की भ्रष्टाचार मुक्त सरकार देने की छवि को दागदार बना सकती है । उदाहरण इसकी कीमतों को लेकर दिया जा सकता है । कांग्रेस का दावा है कि उसके कार्यकाल में एक राफेल की कीमत 550 करोड़ से कुछ ज्यादा थी जिसे बढाकर 1600 करोड कर दिया गया जो रिलायंस कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए था जबकि केंद्र सरकार ये दावा कर रही है कि कीमतों में कमी की गई है । ये ऐसी बाते हैं जो जनता के सामने आनी चाहिए । कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अच्छी तरह जानते हैं कि रक्षा सौदे में जनता सरकार की गर्दन काटने में देर नहीं करती । उनके सामने अपने पिता दिवंगत राजीव गांधी का उदाहरण है । पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बोफोर्स तोप सौदे के दलाली का प्रचार कर अपनी बात इस तरह जनता के सामने रखी कि राजीव गांधी की सरकार चली गई । पटना की एक सभा में वी पी सिंह ने जेब से पर्ची निकाल कुठ अंक पढे और कहा कि ये स्विस बैंक के उस एकाउंट का नंबर है जिसमें बोफोर्स की दलाली में मिले 64 करोड रूपए जमा किये गए । हालांकि बोफोर्स ने 1999 में कारगिल वार में अपनी उपयोगिता साबित की । कारगिल वार में भारतीय सैनिकों ने बोफोर्स तोप का ही इस्तेमाल किया था । ये चुनावी साल है विपक्ष को मौका चाहिए । सरकार अगर मौका देगी तो विपक्ष हमलावर होगा ही । लिहाजा जरूरी है कि केंद्र सरकार इस मामले में छाई धुंध साफ करे ।

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