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सुप्रीम कोर्ट ने माना,विवाहेतर सम्बन्ध अपराध नहीं मुख्य खबरें
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सुप्रीम कोर्ट ने माना,विवाहेतर सम्बन्ध अपराध नहीं
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने विवाहेतर संबंध को अपराध मानने से इंकार किया है । गुरूवार को संविधान पीठ ने अपने फैसले में कहा कि आईपीसी की धारा 497 महिला के सम्मान के खिलाफ है । लोकतंत्र की खूबी मैं ,तुम और हम की है । मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस खानविलकर ने अपने फैसले में कहा कि अडल्टरी तलाक का आधार हो सकता है लेकिन यह अपराध नहीं होगा। 9 अगस्त को हुई सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली पांच जजों की संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी जिसमें जस्टिस आर एफ नरीमन, जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस इंदू मल्होत्रा और जस्टिस ए एम खानविलकर थे । एडल्टरी चीन, जापान, ब्राजील में अपराध नहीं है। कई देशों ने व्यभिचार को रद्द कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शादी के बाद संबंध अपराध नहीं हैं। धारा 497 मनमानी का अधिकार देती है। कोर्ट ने कहा कि आईपीसी 497 महिला के सम्मान के खिलाफ है । महिला और पुरूष को समान अधिकार मिले हुए हैं । कोर्ट ने कहा कि एडल्टरी अब अपराध तो नहीं है , लेकिन अगर इस वजह से आपका पार्टनर खुदकुशी कर लेता है, तो फिर उसे खुदकुशी के लिए उकसाने का मामला माना जा सकता है। 158 साल पुरानी आईपीसी की धारा-497 के तहत अगर कोई शादीशुदा पुरुष किसी अन्य शादीशुदा महिला के साथ आपसी रजामंदी से शारीरिक संबंध बनाता है तो उक्त महिला का पति एडल्टरी के नाम पर उस पुरुष के खिलाफ केस दर्ज करा सकता है। हालांकि, ऐसा व्यक्ति अपनी पत्नी के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकता है और न ही विवाहेतर संबंध में लिप्त पुरुष की पत्नी इस दूसरी महिला के खिलाफ कोई कार्रवाई कर सकती है। इस धारा के तहत ये भी प्रावधान है कि विवाहेतर संबंध में लिप्त पुरुष के खिलाफ केवल उसकी साथी महिला का पति ही शिकायत दर्ज कर कार्रवाई करा सकता है। किसी दूसरे रिश्तेदार अथवा करीबी की शिकायत पर ऐसे पुरुष के खिलाफ कोई शिकायत नहीं स्वीकार होगी।
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