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Engineer's Day Special: ये है एक Lecturer से 'Metro Man' बनने का सफ़र

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Engineer's Day Special: ये है एक Lecturer से 'Metro Man' बनने का सफ़र

“Scientists study the world as it is; engineers create the world that has never been.”      आज यानी 15 सितंबर को पूरे देश में हर साल Engineer's Day का मौका आता है। यह दिन देश के महान इंजिनियर भारत रत्न मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया को समर्पित है। उन्ही के जन्मदिन पर ये दिन मनाया जाता है, जी हाँ.. उनका जन्म 15 सितंबर, 1861 को हुआ था। वह भारत के सिर्फ महान इंजिनियर ही नहीं बल्कि अर्थशास्त्री, स्टेट्समैन के साथ-साथ देश के राष्ट्र निर्माता भी थे। उन्होंने प्राकृतिक स्रोतों से घर-घर पानी की आपूर्ति और गंदे पानी की निकासी के लिए नालियों के निर्माण, बांध और नहर के निर्माण के अलावा औद्योगिक क्षेत्र में भी उल्लेखनीय काम किया। उन्होंने न सिर्फ इंजिनियरिंग के मैदान में असाधारण काम किया बल्कि कुछ मौकों पर देशभक्ति की ऐसी मिसाल पेश की जो अनुकरणीय है।      Engineer's Day के इस ख़ास दिन पर हम आपको परिचित कराने जा रहे हैं एक ऐसे शख्स से जिसकी बदौलत आज बड़े बड़े महानगर अपनी रफ़्पतार पर नाज़ करते हैं और उन्हें 'मेट्रो मैन' के नाम से बुलाते हैं.   ई श्रीधरन; पेशे से सिविल इंजीनियर। वो ‘मेट्रो मैन’ के नाम से इसलिए जाने जाते हैं क्यूंकि उन्होंने अपने नेतृत्व में ‘कोंकण रेलवे’ और ‘दिल्ली मेट्रो’ का निर्माण कर भारत में जन यातायात को बदल दिया। दक्षिण रेलवे में अपनी पोस्टिंग के दौरान 1964 में एक चक्रवात ने पम्बबन ब्रिज को गंभीर रूप से क्षति पहुंचाई थी। इसी ब्रिज के माध्यम से रामेश्वरम तमिलनाडु से जुड़ा था। ये एक बड़ा नुकसान था। रेलवे ने पुल की मरम्मत के लिए छह महीने का लक्ष्य निर्धारित किया। उस दौरान श्रीधरन को इस कार्य के लिए 90 दिन का समय दिया गया और वे उस शामे लगभग 32 साल के थे। 90 दिनों की इस अवधि के कार्य को उन्होंने कुल 46 दिनों के भीतर पूरा कर लिया। इसके चलते उन्हें रेलवे मिनिस्टर की ओर से सम्मानित भी किया गया था।   उनके शुरुआती जीवन की बात करें तो 12 जून 1932 को केरल के पलक्कड़ में पत्ताम्बी नामक स्थान पर उनका जन्म हुआ था। उनके परिवार का सम्बन्ध पलक्कड़ के ‘करुकपुथुर’ से है। प्रारंभिक शिक्षा पलक्कड़ के ही एक स्कूल से हुई जिसके बाद उन्होंने पालघाट के विक्टोरिया कॉलेज में दाखिला लिया। उसके पश्चात उन्होंने ‘सिविल इंजीनियरिंग’ में डिग्री प्राप्त की। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद कुछ समय तक श्रीधरन ने कोझीकोड स्थित ‘गवर्नमेंट पॉलिटेक्निक’ में सिविल इंजीनियरिंग पढ़ाया। उसके बाद लगभग एक साल तक उन्होंने बॉम्बे पोर्ट ट्रस्ट में बतौर प्रसिक्षु कार्य किया। सन 1953 में वे भारतीय लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित ‘इंडियन इंजीनियरिंग सर्विसेज एग्जाम’ में बैठे और उत्तीर्ण हो गए। दक्षिण रेलवे में अपनी सेवा देने के बाद वे उन्होंने देश की पहली मेट्रो की सफलता में अहम भूमिका निभाई। 1970 में इ. श्रीधरन ने भारत की पहली मेट्रो रेल ‘कोलकाता मेट्रो’ की योजना, डिजाईन और कार्यान्वन की जिम्मेदारी उठाई। श्रीधरन ने नाही सिर्फ इस परियोजना को पूरा किया बल्कि इसके द्वारा भारत में आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर इंजीनियरिंग की आधारशिला भी रखी। 1975 में उन्हें कोलकाता मेट्रो रेल परियोजना से हटा लिया गया।

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