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Special: शहर से लुप्त होते पक्षी, पर्यावरणविदों ने जताई चिंता

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Special: शहर से लुप्त होते पक्षी, पर्यावरणविदों ने जताई चिंता

श्राद्ध कर्म में कौवों को श्रद्धा का प्रतीक माना गया है। पितृ पक्ष में पितरों को भोग लगाने के लिए कौवे की तलाश की जा रही है। श्रद्धालु कौवे को खोजने के लिए छतों से लेकर घाटों तक घूम रहे हैं लेकिन कौवे इन दिनों दिख नहीं रहे हैं। कौवों की इस घटती संख्या को देखते हुए पर्यावरणविद भी चिंतित हैं। उनका कहना है कि वर्तमान में ही सरंक्षण को लेकर कोई उपाय नहीं किया गया तो यह भी विलुप्त हो जाएंगे। सुबह जगते ही कौवों की कांव कांव अब नहीं सुनाई देती। पेड़ों की हो रही अंधाधुंध कटाई, बढ़ते कंक्रीट के जंगल का असर पर्यावरण पर तो पड़ ही रहा है, पशु पक्षी भी प्रभावित हो रहे हैं। रसायन युक्त खान पान और लगातार खेतों में हो रहे रसायनों के प्रयोग से पशु पक्षियों का जीवन चक्र भी प्रभावित हो रहा है। इसका असर पक्षियों में गौरैया और कौवों पर देखने को मिल रहा है। गौरैया को तो लोगों ने संरक्षण करना शुरू कर दिया लेकिन कौवों की जनसंख्या लगातार कम होती चली जा रही है। यही स्थिति रही तो कौवे भी गिद्घ की तरह गायब हो जाएंगे। कौवों का महत्व ख़ासकर श्राद्ध के दिनों में महसूस किया जाता है. ज्योतिषाचार्य पं. गणेश प्रसाद मिश्रा के अनुसार कौवा यम का प्रतीक है, जो दिशाओं का फलित यानी शुभ- अशुभ संकेत बताने वाला कहा गया है। इसीलिए श्राद्ध का एक अंश इसे भी दिया जाता है। श्राद्ध पक्ष में कौवों का बड़ा ही महत्व है, कौआ यदि आपके द्वारा दिया गया भोजन ग्रहण कर ले, ऐसा माना जाता है कि पितरों की कृपा आपके ऊपर है, पितृ प्रसन्न हैं, इसके विपरीत यदि कौआ भोजन करने नहीं आये तो यह माना जाता है, कि पितर विमुख हैं या नाराज हैं। भारतीय मान्यता के अनुसार व्यक्ति मरकर सबसे पहले कौवे के रूप में जन्म लेता है और कौवे को खाना खिलाने से वह भोजन पितरों को मिलता है। मान्यता के अनुसार पुराणों में कौवे को देवपुत्र माना गया है। इन्द्र के पुत्र जयंत ने ही सबसे पहले कौवे का रूप धारण किया था। त्रेतायुग में जब भगवान राम ने अवतार लिया और जयंत ने कौवे का रूप धारण कर माता सीता के पैर में चोंच मारा था। तब भगवान राम ने तिनके का बाण चलाकर जयंत की आंख फोड़ दी थी। जब उसने अपने किये की माफी मांगी। उस समय राम ने उसे यह वरदान दिया कि तुम्हें अर्पित किया भोजन पितरों को मिलेगा। तभी से श्राद्ध में कौवों को भोजन कराने की परंपरा चली आ रही है। यही कारण है कि श्राद्ध पक्ष में कौवों को ही पहले भोजन कराया जाता है। बीएचयू के पूर्व प्रोफेसर और पर्यावरणविद डॉ. बीडी त्रिपाठी ने बताया कि इसके पीछे कई कारण हैं। इसमें एक तो पेड़ों की कटाई तो है ही, क्योंकि ये पेड़ों की खोह में ही अपना घोसला बनाते हैं। वहीं दूसरा फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए उपयोग किए जा रहे कीटनाशकों से वे खेतों में पानी पीने के चलते उनका प्रजनन क्षमता प्रभावित हो रही है। मुख्य वन मंडलाधिकारी केके पांडेय ने बताया कि कौवा पर्यावरण के लिए बहुत ही जरूरी पक्षी है। बदलते परिवेश से कौवे अब शहरों को छोड़कर ग्रामीण क्षेत्रों विशेष में समूह में सिमट गए हैं। इनकी संख्या कम होती जा रही है। वन विभाग ने कभी इनकी गणना तो नहीं कराई है, लेकिन इसके लिए शासन को पत्र लिखकर इनके संरक्षण को लेकर चर्चा की जाएगी। सरकार तो संरक्षण कार्य करती ही रही है लेकिन ज़रूरी है कि हम-आप, यानी समाज में रह रहे आम जन भी इस ओर अपना आकर्षण केन्द्रित करें. क्यूकि भले ही सीधे तौर पर हमे इन पशु-पक्षियों के रहने य न रहने से फर्क न पड़ता हो लेकिन इनसे हमारे पर्यावरण पर विशाल असर पड़ता है. इनका ध्यान रखना हमारा कर्त्तव्य है. अगर आप पशु-पक्षियों की सेवा में तत्पर है और इनके संरक्षण में कभी , किसी रूप से योगदान करते हैं, तो नीचे comment box में अपना अनुभव शेयर करें, ताकि हमारे अन्य श्रोता आप से प्रेरणा लें सकें.

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