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जयंती पर ख़ास: जिनका था सादा जीवन और उच्च विचार

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जयंती पर ख़ास: जिनका था सादा जीवन और उच्च विचार

श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ मिलकर भारतीय जनसंघ के रूप में देश को राजनीतिक विकल्प देने वाले और एकात्मक मानववाद के प्रणेता पं. दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें देश के महानतम प्रतीकों में से एक बताया. वहीं बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय एक ऐसे युगद्रष्टा थे जिनके बोए गए विचारों और सिद्धांतों के बीज ने देश को एक वैकल्पिक विचारधारा देने का काम किया. उनकी विचारधारा सत्ता प्राप्ति के लिए नहीं बल्कि राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिए थी. दीन दयाल उपाध्याय के बारे में कहा जाता है कि वह कार्यकर्ताओं को सादा जीवन और उच्च विचार के लिए प्रेरित करते थे. खुद को लेकर अक्सर कहते थे कि दो धोती, दो कुरते और दो वक्त का भोजन ही उनकी संपूर्ण आवश्यकता है. इससे अधिक और क्या चाहिए. दीन दयाल उपाध्याय का बचपन संघर्षों में बीता. उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के नगला चंद्रभान गांव में 25 सितंबर 1916 को ज्योतिष पं. हरीराम उपाध्याय के पौत्र भगवती प्रसाद और राम प्यारी के घर उनका जन्म हुआ. बचपन में ही माता-पिता की छत्र-छाया से वंचित हो गए. तीन साल में पिता और सात साल की उम्र में माता का निधन हो गया था. लिहाजा, गंगापुर और कोटा (राजस्थान) में नाना चुन्नीलाल और मामा राधारमण के यहां उनका पालन-पोषण हुआ. दीनदयाल उपाध्याय ने अंत्योदय का सिद्धांत भी दिया. उन्होंने एक बार कहा था- वे लोग जिनके सामने रोजी-रोटी का सवाल है, जिन्हें न रहने के लिए मकान है और न तन ढकने के लिए कपड़ा. अपने मैले-कुचैले बच्चों के बीच जो दम तोड़ रहे हैं और शहरों के उन करोड़ों निराश भाई-बहनों को सुखी व संपन्न बनाना हमारा लक्ष्य है. व्यक्तिवाद अधर्म है. राष्ट्र के लिए काम करना धर्म है.

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