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Special: भाग्य से होते हैं बेटे, 'सौभाग्य' से बेटियां

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Special: भाग्य से होते हैं बेटे, 'सौभाग्य' से बेटियां

आज यानी रविवार World Daughter's Day के रूप में मनाया जा रहा है. यानी दुनिया भर की बेटियों के लिए खास दिन. कहावत है कि बेटे वंश को आगे बढ़ाते हैं लेकिन घर की रौनक बेटियों की खिलखिलाहट से ही आती है. वो एक बेटी ही होती है जो बिना बोले मां की हर तकलीफ समझ जाती है. कभी वो मां की प्यारी सी बेटी गुड़िया बन जाती है तो कभी उनकी परेशानियों में उनका साथ देने वाली, रसोई में उनका हाथ बटाने वाली, उनके सीक्रेट शेयर करने वाली उनकी सबसे अच्छी दोस्त. एक बेटी जितना अपनी मां के करीब होती है उतना ही पिता की दुलारी और लाडली. किसी भी बेटी के लिए उसके पापा ताउम्र सुपरहीरो होते हैं जो उसे किसी भी परेशानी से बचा सकते हैं. एक बेटी होने से पिता और ज्यादा केयरिंग और इमोश्नल हो जाते हैं. कुल मिला कर बेटियां रिशतों में एक नई जान भर देती है. इन्हीं बेटियों के नाम है आज का यह खास दिन. भारत की बात करें तो यूं तो देश में बेटियों को देवी के रूप में पूजा जाता है लेकिन इसी देश में आज की 21 वीं सदी में भी समाज उस घृणित मानसिकता से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाया है जिस मानसिकता के तहत बेटियों को बोझ समझा जाता रहा है। इन सबके इतर बेटियों ने समय समय पर समाज के इस रूढ़िवादी दरवाजे को तोड़ा और अपनी काबिलियत को सिद्ध करते हुए समाज को आइना दिखाया कि हम किसी से कमतर नहीं। आज न जाने कितने ऐसे उदाहरण देखने को मिलते हैं जो बेटियों को बोझ समझने की संकुचित मानसिकता को तिस्कृत करते हैं। कुछ ऐसा ही उदाहरण प्रस्तुत कर रही हैं राजस्थान के एक छोटे से कस्बे में रहने वालीं अरुणिमा, जो अपने पिता के कंधे का सहारा बनते हुए उन्हें कभी बेटों की कमी महसूस नहीं होने देतीं और उनके पिता भी अपनी बेटियों पर फक्र करते हुए आज फ़ूले नहीं समाते। मोहन साहू एक व्यवसायी हैं और उनकी तीन बेटियां हैं। सबसे बड़ी लड़की की शादी हो चुकी है जबकि उससे छोटी दो लड़कियां अभी पढ़ाई कर रही हैं। दोनों बेटियां पढ़ाई के साथ साथ अपने पिता की हर ज़िम्मेदारी को बखूबी निभाती हैं। चाहे दुकान संभालने की ज़िम्मेदारी हो या मार्केटिंग करने की मोहन साहू की दूसरी बेटी अरुणिमा पूरी ज़िम्मेदारी से पिता के कंधों का सहारा बनती है। स्कूल व् पढ़ाई की ज़िम्मेदारियों के इतर बेटी अरुणिमा व्यवसाय की भी पूरी देखरेख करती है यहां तक कि जब उसके पिता कहीं बाहर गए हुए होते हैं तो बेटियां से घर से लेकर प्रतिष्ठान तक की जिम्मेदारियां बखूबी संभालती हैं। चेहरे पर मुस्कुराहट और एक चमक लिए हुए मोहन साहू कहते हैं कि उनकी बेटियां उनके लिए सबकुछ हैं।

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