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अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस: "दरख़्त, जिनमें है हमारा घोंसला"

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अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस: "दरख़्त, जिनमें है हमारा घोंसला"

एक पेड़ जितना ज्यादा बड़ा होता है वह उतना ही अधिक झुका हुआ होता है यानि वह उतना ही विनम्र और दूसरों को फल देने वाला होता है. यही बात समाज के उस वर्ग के साथ भी लागू होती है जिसे आज की तथाकथित युवा और एजुकेटेड पीढ़ी बूढ़ा कहकर वृद्धाश्रम में छोड़ देती है. वह लोग भूल जाते हैं कि अनुभव का कोई दूसरा विकल्प दुनिया में है ही नहीं. अनुभव के सहारे ही दुनिया भर में बुजुर्ग लोगों ने अपनी अलग दुनिया बना रखी है. जिस घर को बनाने में एक इंसान अपनी पूरी जिंदगी लगा देता है, वृद्ध होने के बाद उसे उसी घर में एक तुच्छ वस्तु समझी जाता है. बड़े बूढ़ों के साथ यह व्यवहार देखकर लगता है जैसे हमारे संस्कार ही मर गए हैं. बुजुर्गों के साथ होने वाले अन्याय के पीछे एक मुख्य वजह सोशल स्टेटस मानी जाती है. सब जानते हैं कि आज हर इंसान समाज में खुद को बड़ा दिखाना चाहता है और दिखावे की आड़ में बुजुर्ग लोग उसे अपनी सुंदरता पर एक काला दाग दिखते हैं. बड़े घरों और अमीर लोगों की पार्टी में हाथ में छड़ी लिए और किसी के सहारे चलने वाले बूढ़ों को अधिक नहीं देखा जाता, वह इन बुढ़े लोगों को अपनी आलीशान पार्टी और अपने जीवन में शामिल करना तथाकथित शान के खिलाफ समझते हैं. यही रुढ़िवादी सोच उच्च वर्ग से मध्यम वर्ग की तरफ चली आती है. आज के समाज में मध्यम वर्ग में भी वृद्धों के प्रति स्नेह की भावना कम हो गई है. यदापि पोष मातरं पुत्र: प्रभुदितो धयान् . इतदगे अनृणो भवाम्यहतौ पितरौ ममां ॥

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