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Day's Spl: Azad Hind Sena | Force behind Indian Freedom

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Day's Spl: Azad Hind Sena | Force behind Indian Freedom

देश का पहला स्वतंत्रता दिवस मुबारक हो | . भारत में शायद ही कोई बच्चा होगा जिसने बचपन में इस गीत पर कदम ताल न किया हो जी हाँ हमारी आज़ादी की ओर पहला कदम इसी गीत के साथ बढ़ा था ...... 21 अक्टूबर 1943 हमारा पहला स्वतंत्रता दिवस .... सुभाष बोस ने आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपीन्स, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड ने मान्यता दे दी। जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप इस अस्थायी सरकार को दे दिये। सुभाष उन द्वीपों में गये और उनका नया नामकरण किया। अंडमान का नया नाम शहीद द्वीप तथा निकोबार का स्वराज्य द्वीप रखा गया। 30 दिसम्बर 1943 को इन द्वीपों पर स्वतन्त्र भारत का ध्वज भी फहरा दिया गया। 4 फ़रवरी 1944 को आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा भयंकर आक्रमण किया और कोहिमा, पलेल आदि कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त करा लिया। इस आक्रमण से अंग्रेजो के साम्राज्य की चूले हिल गई थी वो इस लिए क्यों की द्वितीय विश्व युद्ध अंग्रेजो की तरफ से ज्यादातर सैनिक भारत के थे और उनके ह्रदय में आजाद हिन्द फ़ौज के लिए हमदर्दी बढती जा रही थी ! अंग्रेजो को डर था की अगर आजाद हिन्द फ़ौज का सामना हुआ तो उनके सैनिक बागी भी हो सकते है ! किन्तु दुर्भाग्यवश युद्ध का पासा पलट गया। जर्मनी ने हार मान ली और जापान को भी घुटने टेकने पड़े। ऐसे में सुभाष को टोकियो की ओर पलायन करना पड़ा और कहते हैं कि हवाई दुर्घटना में उनका निधन हो गया। यद्यपि उनका सैनिक अभियान असफल हो गया, किन्तु इस असफलता में भी उनकी जीत छिपी थी। निस्सन्देह सुभाष उग्र राष्ट्रवादी थे। उनके मन में फासीवादी अधिनायकों के सबल तरीकों के प्रति भावनात्मक झुकाव भी था और वे भारत को शीघ्रातिशीघ्र स्वतन्त्रता दिलाने हेतु हिंसात्मक उपायों में आस्था भी रखते थे। इसीलिये उन्होंने आजाद हिन्द फौज का गठन किया था। यद्यपि आज़ाद हिन्द फौज के सेनानियों की संख्या के बारे में थोड़े बहुत मतभेद रहे हैं परन्तु ज्यादातर इतिहासकारों का मानना है कि इस सेना में लगभग चालीस हजार सेनानी थे। इस संख्या का अनुमोदन ब्रिटिश गुप्तचर रहे कर्नल जीडी एण्डरसन ने भी किया है। 26 जुलाई 1945, ब्रिटेन में हुए आम चुनावों में प्रधानमंत्री चर्चिल को मुंह की खानी पड़ी और क्लीमेंट एटली प्रधानमंत्री बना। इस समय तक कांग्रेसी नेताओं को नेताजी और उनकी आजाद हिंद फौज के बारे में पता लग चुका था। कांग्रेस नेतृत्व और अंग्रेज सरकार दोनों ही एक-समान दुविधा के शिकार थे। नेताजी के साथ कैसा व्यवहार हो। क्या उन्हें बंदी बनाकर भारत लाया जाए? 1945 को अंग्रेज सरकार ने आजाद हिंद फौज के लगभग 600 सैनिकों पर अदालत में मुकदमा चलने और बाकियों के बर्खास्त होने की बात कही। अपर इसका उल्टा ही असर हुआ देश में देशद्रोही बताने से, उनकी लोकप्रियता में ही वृद्धि हुई। इन मुकदमों से बने राष्ट्रवादी माहौल से सशस्त्र सैनिक भी अछूते नहीं रहे। सेना मुख्यालय ने आजाद हिंद फौज के मुकदमों की भारतीय सेना पर प्रभाव और सैनिकों की भावनाओं का आकलन करने के लिए एक विशेष दल गठित किया। अब देश में विद्रोह की स्थिति में भारतीय सेना के लिए इस्तेमाल पर गहरा सवालिया निशान था। यानि आजाद हिन्द फ़ौज के हैरतअंगेज कारनामों ने सभी भारतीयों को झकझोर दिया और उनमें देशभक्ति की भावना को पहले से अधिक प्रबल कर दिया। इसी का परिणाम 1946 में बंबई में भारतीय नौसेना में विद्रोह के रूप में सामने आया। इस तरह, आज़ाद हिंद फौज ने हारकर भी अंग्रेजी उपनिवेशवाद के कफन में अंतिम कील गाड़ने में सफल रही। और खास बात ये थी आजाद हिन्द फ़ौज के लिए सावरकर ने सुभाष चन्द्र बोस को रास बिहारी बोस के पास जापान भेजा था रासबिहारी बोस ने 4 जुलाई 1943 को 46 वर्षीय सुभाष को आजाद हिन्द फ़ौज नेतृत्व सौंप दिया था........... तो आज 21 oct को आप सभी को देश का पहला स्वतंत्रता दिवस मुबारख हो जय हिन्द

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