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संविधान दिवस 2019ः देश का मान 'संविधान'

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संविधान दिवस 2019ः देश का मान 'संविधान'

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत का शासन चलाने वाला दुनिया का बड़ा लिखित संविधान लिखित ही नहीं बल्कि हस्तलिखित भी था जिसे मसौदा लिखने वाली समिति ने हिंदी, अंग्रेजी में हाथ से लिखकर कैलिग्राफ किया था और इसमें कोई टाइपिंग या प्रिंटिंग शामिल नहीं थी। दरअसल, हाथ से लिखे गए इस महान दस्तावेज को छापने का गौरव देहरादून स्थित सर्वे ऑफ इंण्डिया को मिला जिसे उसने लगभग 5 सालों में पूरा किया। उस समय छपी संविधान की हजार ऐतिहासिक प्रतियों में से एक प्रति संसद के पुस्तकालय में तो एक अन्य प्रति को आज भी देहरादून में सुरक्षित रखा गया है। संविधान सभा द्वारा 2 वर्ष, 11 माह, 18 दिन में कुल 114 दिन की बहसों के बाद डॉ. भीमराव आम्बेडकर द्वारा तैयार किए गए संविधान का ढांचा जब 26 नवम्बर 1949 को अंगीकृत किया गया तो उसे प्रकाशित करने की भी एक चुनौती थी क्योंकि मसौदा समिति और खासकर भारतीय नेतृत्व भारतीय लोकतंत्र के इस पवित्र ग्रन्थ की मौलिकता, स्वरूप और स्मृतियों को अक्षुण बनाए रखने के लिए उसे उसी हस्तनिर्मित साजसज्जा के साथ हूबहू प्रकाशित करना चाहता था। चूंकि उस समय प्रिंटिंग की आज की तरह अत्याधुनिक सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं और उस समय के लिहाज से सबसे बड़ा एवं सुसज्जित छापाखाना केवल देहरादून स्थित भारतीय सर्वेक्षण विभाग या सर्वे ऑफ इंडिया के पास ही उपलब्ध था, इसलिए संविधान सभा ने इसी विभाग को इस ऐतिहासिक जिम्मेदारी का निर्वहन करने का दायित्व सौंपा। विभाग के देहरादून स्थित नॉदर्न प्रिंटिंग ग्रुप ने पहली बार संविधान की एक हजार प्रतियां प्रकाशित की। इसे फोटोलिथोग्राफिक तकनीक से प्रकाशित किया गया। हाथ से लिखी गई मूल प्रति नई दिल्ली के नेशनल म्यूजियम में मौजूद है, जबकि यादगार के तौर पर संविधान की एक प्रति संसद के पुस्तकालय में तो एक अन्य प्रति आज भी देहरादून के सर्वे ऑफ इंडिया के म्यूजियम में सुरक्षित है।

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