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BUDGET DICTIONARY: Deficit Financing/ घाटे का वित्तपोषण

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BUDGET DICTIONARY: Deficit Financing/ घाटे का वित्तपोषण

जब कभी सरकार की आय उसके द्वारा द्वारा किये जाने वाले व्ययों से कम हो जाती है तो बजट में इस प्रकार के घाटे को पूरा करने के लिए जो व्यवस्था अपनाई जाती है उसे घाटे की वित्त व्यवस्था या हीनार्थ प्रबंधन कहते है. घाटे की वित्त व्यवस्था को तीन प्रकार से पूरा किया जाता है. 1. नए नोट छापकर, 2. विदेशी ऋण लेकर (from Developed countries and international institutions) 3. आंतरिक ऋण लेकर अर्थात देश की जनता से ऋण लेकर ( through Ad-hoc Treasury Bills, government bonds etc) भारत में जब सरकार की कुल आय (राजस्व खाता + पूँजी खाता) उसके कुल व्यय से कम हो जाती है तो इस कमी को पूरा करने के लिए सरकार रिज़र्व बैंक में जमा अपने नकद कोषों से धन निकालती है अथवा रिज़र्व बैंक तथा व्यापारिक बैंकों से ऋण लेती है या फिर नए नोट छापती है. ध्यान रहे कि ऊपर बताये गए तीनों उपायों से देश की अर्थव्यवस्था में मुद्रा की पूर्ती में वृद्धि हो जाती है जिसके कारण कीमतों में वृद्धि हो जाती है. इसी कारण घाटे की अर्थव्यवस्था को “मुद्रा पूर्ती विचार” भी कहा जाता है. घाटे की वित्त व्यवस्था देश के राजकोषीय घाटे के बराबर होती है.

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