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बीमारी या डर: Delhi में आज भी आधी रात में क्यों जाग जाते है लोग....

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बीमारी या डर: Delhi में आज भी आधी रात में क्यों जाग जाते है लोग....

इस समय वैसे तो पूरे देश में कोरोना वायरस की ही ख़बरे आपको सुनने को मिल रही होंगी और इस बीमारी को लेकर सब बहुत हैरान परेशान है लेकिन इन ख़बरों के बीच उनकी परेशानी कहीं छुप सी गयी है जिन्हे आज भी नींद में दिल्ली के दंगे दहशत के कारण सोने नहीं दे रहे है...उत्तर-पूर्वी दिल्ली के अलग-अलग इलाक़ों में बड़ी संख्या में लोग को कुछ ऐसी ही तकलीफ़ों से दो-चार हो रहे हैं.11 साल की फ़ातिमा सोते-सोते अचानक चौंककर जग जाती हैं. उसकी मां सलमा बताती हैं कि उन्हें पसीने से तर-बतर अपनी डरी-सहमी बेटी को दोबारा सुलाने के लिए घंटों मशक्क़त करनी पड़ती है.तो वहीँ खजूरी ख़ास के रहने वाले नाज़िम बताते हैं कि उनके मोहल्ले की एक अधेड़ महिला दंगों के बाद इस क़दर डर गई थीं कि पड़ोसियों को अपने पास से हिलने भी नहीं देती थीं. नुज़हत बताती हैं, "हफ़्ते भर से ज़्यादा हो गया लेकिन मेरे कानों में अब भी दंगाइयों की आवाज़ें गूंजती हैं. रात में ठीक से नींद नहीं आती. थोड़ी-सी भी आवाज़ होती है तो धड़कनें तेज़ हो जाती हैं कि कहीं फिर से हमला तो नहीं हो गया." उत्तर-पूर्वी दिल्ली के चंदू नगर में रहने वाले सदरे आलम की मानसिक स्थिति पहले से ही कुछ ठीक नहीं थी लेकिन दंगों के बाद उनकी हालत दिन पर दिन बदतर हो रही है अपने जले हुए घर में बैठकर आज भी वो अपनी आईडी कार्ड तो कभी कोई कागज़ देखते है और फिर अचानक से चीखकर रोने लगते है...ये सभी लोग दंगों की डरावनी यादें भुलाकर अपनी बिखरी ज़िंदगियों को फिर से बसाना चाहते हैं लेकिन जले मकानों और दुकानों की राख से आने वाली तीखी गंध जैसे उनकी नाक के रास्ते सिर में चढ़ गई है. हर जगह तोड़-फोड़ के निशान, जली हुई चीज़ें और बिखरे हुए सामान उनकी भयावह यादों को ज़रा भी धूमिल नहीं होने देते...कोरोना वायरस जैसी बिमारियों से लड़ने के के लिए सारी दुनिया एक साथ खड़ी है पर क्या ऐसे दंगो से निपटने के लिए हमारा देश खड़ा नहीं हो सकता क्या...

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