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Women's day special: सशक्त महिला, आत्मनिर्भर समाज, सबके साथ से हो रहा विकास |

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Women's day special: सशक्त महिला, आत्मनिर्भर समाज, सबके साथ से हो रहा विकास |

हौसलों को पंख मिल जाएं, तो कोई पीछा नहीं कर सकता। अपने देश की नारियों ने हमेशा से दुनिया में अलग जगह बनाई है। अब तो महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़कर टक्कर दे रही हैं। शायद ही कोई क्षेत्र ऐसा बचा हो, जिसमें उन्होंने समाज को चुनौती न दी हो। महिला दिवस के मौके पर ऐसी बेमिसाल महिलाओं का जिक्र लाजिमी है और जरूरी भी। हौसला, जज्बा, जुनून लिंगभेद को भी मात दे देता है। तभी तो देश की अनेक महिलाएं अपने क्षेत्र में पुरुषों से भी 'बीस' साबित हुई हैं। किसी के जुनून ने उसे लेखक बना दिया, तो कोई अपने जज्बे में जंगल की दुनिया में रम गई। प्रस्तुत है ऐसी ही पांच महिलाओं की अद्भुत कहानियां। वो महिला जिसने रुपये उधार लेकर फैलाई स्वाद की खुशबू- निलजा वांग्मो उस संघर्षशील औरत का नाम है, जिसने दुर्गम पहाड़ी गांव में जन्म लेने के बाद भी अपनी अलग पहचान बनाई। उनका जन्म अलची गांव में हुआ, जो लद्दाख की राजधानी लेह से लगभग 70 किलोमीटर नीचे सिंधु नदी के तट पर स्थित है। ऐसे दुर्गम स्थान से ज्यादा दुश्कर हालात निलजा के जीवन में तब आ गए, जब उन्होंने अपने पिता को खो दिया। तंगहाली की वजह से कॉलेज की पढ़ाई बीच में ही छूट गई। निलजा को बचपन से विभिन्न प्रकार के व्यंजन पकाने का शौक था। उन्होंने शौक को ही कॅरियर बनाने की ठान ली, और ‘अलची किचन’ नाम से लद्दाखी रेस्टोरेंट की शुरुआत की। फिर ‘अलची किचन’ के खास मैन्यू पर कसरत की और ऐसे लद्दाखी व्यंजनों को खोजा, जो लुप्त हो चुके थे। आज इस किचन की फर्मेंटेड ब्रेड खंबीर और ताशी ताग्ये चाय सबसे ज्यादा पसंद की जाती है। जानते हैं एक ऐसी लड़की के बारे में जिसने छोटी-सी उम्र में किए बड़े काम - जिस उम्र में बच्चे बेपरवाह होकर जिंदगी का लुत्फ उठाते हैं, उस उम्र में रजिया सुल्तान ने देश और अपने गांव का नाम रोशन कर दिया। मेरठ के गांव नंगला कुंभा में जन्मीं रजिया बचपन में फुटबॉल सिलने का काम करती थीं। उसके बाद वह पढ़ाई करतीं। तभी उनके मन में विचार आया कि जो बच्चे दिन भर बाल मजदूरी करते हैं, वे तो कभी पढ़ ही नहीं पाते हैं। वह ‘बचपन बचाओ’ आंदोलन के साथ जुड़ गईं। इस आंदोलन के कैंपेन के तहत उन्हें गांव का बाल प्रधान चुना गया। जब वह छठी कक्षा में थीं, तो उन्होंने बाल मजदूरी में लगे बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रेरित करना शुरू किया। छोटी-सी उम्र में बड़े कार्यों को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने उनको 'मलाला अवार्ड' से सम्मानित किया। 21 साल की रजिया, मदर टेरेसा को आदर्श मानती हैं। अपने सपने के बारे में दो टूक कहती हैं, "मैं बाल मजदूरी खत्म करना चाहती हूं, न केवल मेरे गांव में, बल्कि पूरे देश से।"

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