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पाकिस्तानी लड़कियों की दुआ, जिसने इंटरनेट पर आग लगा दी है

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पाकिस्तानी लड़कियों की दुआ, जिसने इंटरनेट पर आग लगा दी है

संगीत बहुत अच्छी चीज़ है. आप कहेंगे इसमें नया क्या बताया! तो नया ये कि कई बार बड़ी-बड़ी तकरीरें जो बात नहीं कह पातीं, वो महज़ पांच-सात मिनट का एक गीत कह पाने में कामयाब रहता है. इस इंटरनैशनल विमेंस डे पर एक ऐसा ही गीत रिलीज़ हुआ, जिसने जेंडर इक्वैलिटी को हंसते-खेलते समझा दिया. वो गीत, जो पड़ोसी मुल्क से आया है और यकीन जानिए बेहद खूबसूरती से लिखा और परफॉर्म किया गया है. आज बात इसी गीत की. शोएब मंसूर. नाम तो सुना ही होगा. न याद आ रहा हो तो याद दिला देते हैं. ये वही शख्स हैं, जिन्होंने ‘बोल’ और ‘ख़ुदा के लिए’ जैसी अप्रतिम फ़िल्में दी हैं. इनमें उन्होंने मज़हब की खामियों से जमकर लोहा लिया. इस बार वो पैट्रियार्की यानी पुरुषवाद पर मुखर हुए हैं. और क्या कमाल ढंग से हुए हैं. गाया है दामिया फारूक, शहनाज़ और महक अली ने. फिल्माया गया है पाकिस्तान की टॉप हीरोइन माहिरा ख़ान पर. 1902 में अल्लामा इक़बाल ने एक नज़्म लिखी. जिसे बच्चे की दुआ कहा गया. दुनियाभर में सराही गई उस नज़्म के शुरुआती बोल थे, लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी ज़िंदगी शम्मा की सूरत हो खुदाया मेरी 118 साल बाद शोएब मंसूर उसी तर्ज पर एक और दुआ लेकर आए हैं. दुआ-ए-रीम. यानी दुल्हन की दुआ. ये इकबाल की नज़्म का स्पिन ऑफ कहा जा सकता है. ये दुआ दो हिस्सों में है. एक में है ‘दुल्हन को नसीहत’ और दूसरे हिस्से में ‘दुल्हन की बगावत’. तालियों की गूंज के बीच ख़त्म होती इस दुआ को सुनकर आपका भी ताली पीटने का मन करता है. शोएब मंसूर की ये दुआ महज़ कुछ मिनटों में कई सारी अहम चीज़ों को छू जाती है. जैसा कि मैंने शुरुआत में ही कहा था ये दुआ, महज़ सात मिनट कुछ सेकंड्स में लड़कियों के अंदर ऊर्जा भरने की सलाहियत रखती है. इससे जुड़े हर एक शख्स का खूब सारा शुक्रिया.

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