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आज की मुस्कान: “रात पर क्यों हो सिर्फ पुरुषों का अधिकार?”

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आज की मुस्कान: “रात पर क्यों हो सिर्फ पुरुषों का अधिकार?”

स्वागत है आपका मुख्य खबर में हमारी ख़ास पेशकश में. ‘रण-रागिनी’, रण की रागिनी, रण का राग गानेवाली, कितनी सुन्दर कल्पना होगी इस नाम के पीछे! लेकिन सच तो यह है कि यह नाम किसी कल्पना से नहीं, बल्कि ज़िन्दगी के रण को रागिनी में परिवर्तित करते संघर्ष की देन है। ऐसा संघर्ष, जो समाज से है, जो पितृसत्तात्मक सोच से है, जो औरतों के कामों पर संदेह से है। सुप्रभात दोस्तों! हमारी 'आज की मुस्कान' है कहानी, समाज के रण की रागिनी बन अपना अस्तित्व बनाती महिलाओं की, जो पुरुषों से दो-दो हाथ करने को तैयार हैं। पुणे की दीपा परब, जिन्होंने समाज के नियमों और सोच के अनुसार न चलकर अपने लिए एक अलग पहचान बनाई है। ‘रणरागिनी‘ दीपा द्वारा बनाया गया देश का पहला महिला बाउंसर ग्रुप है, जो लोगों की सुरक्षा का ज़िम्मा उठाए हुए है। दीपा परब महिलाओं और पुरुषों के बीच होने वाले इस फर्क को मिटाना चाहती हैं। वो कहती हैं कि क्या रात पर पुरुषों का एकाधिकार है? क्यों महिलाऐं रात में बाहर नहीं जा सकतीं? और अगर वो ऐसा करती हैं, तो उसकी नैतिकता और चरित्र पर सवाल क्यों उठाए जाते हैं? इन सवालों का जवाब वो रणरागिनी बन कर दे रही हैं। लोगों को अपनी ऐसी छोटी मानसिकता को बदलना होगा और ये बदलाव सिर्फ महिलाऐं ही ला सकती हैं। दीपा परब की इस खूबसूरत, लेकिन चुनौतीपूर्ण कहानी को सुनकर हर व्यक्ति जोश से लबरेज़ हो सकता है। यदि आप भी दीपा की रणरागिनियों से जुड़ना चाहते हैं, तो उनके फेसबुक पेज के ज़रिये उनसे संपर्क साध सकते हैं। हो सकता है दीपा परब का साथ देकर आप भी अपने अंदर छुपी हुई रणरागिनी से मिल पाएं! साथ ही हमसे जुड़िये हर सुबह ठीक 6 बजे , ऐसी ही अनोखी और दिल खुश कर देने वाली अनमोल कहानियों के साथ. धन्यवाद

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