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महादेवी वर्मा: विरह पथ पर प्रेम बरसाने वाली ‘नीर भरी दुख की बदली’

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महादेवी वर्मा: विरह पथ पर प्रेम बरसाने वाली ‘नीर भरी दुख की बदली’

हिंदी साहित्‍य को जिन रचनाकारों ने अपनी अलग पहचान के साथ समृद्ध किया है, उनमें महादेवी वर्मा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. महादेवी हिंदी साहित्‍य के छायावादी युग की कवयित्री हैं. इनकी कविताओं में करुणा, संवेदना और दुख के पुट की अधिकता है. इन्‍हें ‘आधुनिक मीराबाई’ भी कहा जाता है. 26 मार्च आज महादेवी जी का जन्मदिन है. वैसे तो अपने देश की संस्‍कृति में हर कन्‍या या स्‍त्री को देवी को दर्जा दिया जाता है. इनके परिवार में सात पीढ़ियों के बाद कोई लड़की पैदा हुई थी, इसलिए इनका नाम महादेवी रखा गया. आगे चलकर इन्‍होंने महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़कर अपने नाम को सार्थक किया. महादेवी का निजी जीवन उस दौर की अन्‍य महिलाओं से काफी अलग रहा. तब बाल विवाह चलन में था. जब ये 9 बरस की थीं, तभी इनका विवाह कर दिया गया. विवाह के वक्‍त वे अबोध बालिका थीं, पर बाद में भी ताउम्र वैवाहिक जीवन के प्रति वे उदासीन बनी रहीं. कारण पूरी तरह स्‍पष्‍ट नहीं, लेकिन इसके पीछे बौद्ध दर्शन का प्रभाव माना जा सकता है. वे बौद्ध भिक्षुणी बनना चाहती थीं, पर बाद में कर्मयोग को अपनाया. महादेवी साहित्‍य जगत में महिला सशक्‍त‍िकरण का प्रतीक हैं. वे कई लेखिकाओं के लिए प्रेरणास्रोत बनीं. तब कवि महिलाओं के प्रति संवेदना से सनी कविताएं रचते थे. महादेवी ने इस संवेदना की जगह स्‍वयंवेदना को शब्‍दों में पिरोया, मतलब अपने मन के भाव को खुद आकार दिया. महादेवी जी की तमाम सुंदर रचनाओं के बीच ‘मैं नीर भरी दुख की बदली’ काफी लोकप्रिय है. इसकी खासियत यह है कि इसमें महादेवी ने अपना परिचय चंद शब्‍दों में कविता के जरिए समेट दिया है. ख़बरी की ओर से इस महादेवी को शत-शत नमन.

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