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Lockdown में दूध को तरस रही 'नागरिकता'

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Lockdown में दूध को तरस रही 'नागरिकता'

पिछले साल दिसंबर 2019 में जब लोकसभा में नागरिकता बिल पास हुआ था, पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थी इस बिल से काफी खुश थे। उसी दौरान भारत में सात साल से शरण लेकर रह रहे एक हिंदू शरणार्थी की पत्नी ने बेटी को जन्म दिया था और बेटी का नाम नागरिकता रखा था। उस दौरान कई संस्थाओं ने मदद करने का एलान किया था। वहीं ‘नागरिकता’ को भी लॉकडाउन में कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। उसके लिए दूध का इंतजाम नहीं हो पा रहा है क्योंकि उसके पिता ईश्वरलाल और मां आरती के पास बस्ती के अन्य लोगों की तरह इस समय कोई काम नहीं है।दिल्ली पुलिस और राजधानी की अनेक सामाजिक संस्थाएं इस पाकिस्तानी-हिन्दू शरणार्थी बस्ती में भी खाना और राशन के सामान बांट रही हैं। शरणार्थी कैंप के परिवारों को इन सामानों पर ही निर्भर रहना पड़ रहा है।सामान्य दिनों में वे सड़क के किनारे रेहड़ी-पटरी पर कुछ सामान बेचकर या कहीं मजदूरी कर कुछ पैसे कमा लेते थे, जिससे उनकी जिन्दगी आसानी से गुजर जाती थी।लेकिन कोरोना ने उनकी जिंदगी मुश्किल कर दी है। बस्ती के ज्यादातर परिवारों के सामने भुखमरी जैसी स्थिति पैदा हो गई है।

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