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KHABRI SPL: कविवर टैगोर : कुछ विवाद – कुछ प्रवाद

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KHABRI SPL: कविवर टैगोर : कुछ विवाद – कुछ प्रवाद

1905 में बंग-भंग आंदोलन के समय जब सामाजिक एकता पुष्ट करने की दृष्टि से कुछ लोगों ने बंगाल में दुर्गा के रूप के साथ भारतमाता के रूप को मिलाकर एक नए रूप में दुर्गापूजा सार्वजनिक रूप से मनाने का निश्चय किया और इसके लिए गुरुदेव से दुर्गा की भक्ति एवं आराधना का गीत लिखने का अनुरोध किया, तो उन्होंने ऐसा गीत लिखने से साफ़ इनकार कर दिया । उन्होंने कहा कि दुर्गा में मेरी कोई आस्था नहीं है, यह भक्ति मेरे अंतःकरण से नहीं हो सकेगी, ऐसा गीत लिखना तो मेरे लिए अपराध जैसा होगा । ऐसे प्रभल सिद्धांतों वाले, विवादों की परवाह ना करने वाले थे रबीन्द्रनाथ टैगोर। जब भारत गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था तब कलकत्ता; जो आज कोलकाता है, वहां एक ऐसी शख्सियत का जन्म हुआ जिसने देश में वैचारिक आजादी का बीज बोया। इस शख्स का नाम था रबींद्रनाथ टैगोर जिन्हें हम गुरुदेव के नाम से से जानते हैं। राष्ट्रवाद पर बिल्कुल अलग तरह का विचार रखने वाले इस महान कवि, दार्शनिक और समाज सुधारक के जन्मदिन पर हम उनके जीवन की कुछ अहम् बातों से आपको रूबरू करवाना चाहते हैं. गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई 1861 में हुआ था। उनके पिता का नाम देवेंद्रनाथ टैगोर और माता का नाम शारदा देवी था। उनकी स्कूल की पढ़ाई प्रतिष्ठित सेंट जेवियर स्कूल में हुई। पिता ने बैरिस्टर बनाने की चाहत में 1878 में इंग्लैंड के ब्रिजटोन पब्लिक स्कूल में उनका नाम दर्ज कराया। टैगोर ने लंदन कॉलेज विश्वविद्यालय में कानून का अध्ययन किया लेकिन 1880 में बिना डिग्री हासिल किए ही वापस आ गए। रबीन्द्रनाथ टैगोर को बचपन से ही कविताएं और कहानियां लिखने का शौक था। 1915 में ब्रिटिश सत्ता ने रबींद्रनाथ टैगोर को नाइटहुड की उपाधि से सम्मानित किया था। हालांकि 1919 में जलियांवाला बाग नरसंहार के बाद टैगोर ने यह उपाधि लौटा दी थी। फिर ब्रिटिश सरकार ने उनको 'सर' की उपाधि वापस लेने के लिए मनाया था, मगर वह राजी नहीं हुए। जैसा की हम सब जानते ही हैं कि रबींद्रनाथ टैगोर नोबेल पुरस्कार जीतने वाले पहले भारतीय थे। उन्हें 1913 में उनकी कृति गीतांजली के लिए इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। रबींद्रनाथ टैगोर अकेले ऐसे रचनाकार हैं जिनकी दो रचनाएं दो देशों का राष्ट्रगान बनीं। इनका लिखा 'जन गण मन' भारत का, तो 'आमार सोनार बांग्ला' बांग्लादेश का राष्ट्रगान बना। श्रीलंका का राष्ट्रगान टैगोर के शिष्य आनंद समराकून ने लिखा था। टैगोर अपनी सदी के महान रचनाधर्मी ही नहीं थे, बल्कि वो इस पृथ्‍वी के पहले ऐसे इंसान थे जो पूर्वी और पश्चिमी दुनिया के मध्‍य सेतु बने थे। प्रोस्टेट कैंसर की वजह से रबींद्रनाथ टैगोर का निधन 7 अगस्त 1941 को कलकत्ता में ही हुआ। टैगोर का लोगों के बीच इतना ज्यादा सम्मान था कि लोग उनकी मौत के बारे में बात नहीं करना चाहते थे, वो ऐसा दर्शाते थे की टैगोर अभी भी दुनिया में हैं, और सच ही तो है, आज भी रबींद्रनाथ टैगोर हमारे दिलों में जीवित हैं.

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