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सरकार पर दाग लगा गया अकबरनामा

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सरकार पर दाग लगा गया अकबरनामा

साढ़े चार साल की साफ सुथरी मोदी सरकार पर आखिर दाग लग ही गया और सरकार को पत्रकार से नेता बने एमजे अकबर से इस्तीफा लेना पडा। अगर पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव और छह महीने बाद होने वाले आम चुनाव सिर पर नहीं होते तो पीएम नरेंद्र मोदी अकबर से इस्तीफा लेने की जहमत नहीं उठाते । हालांकि एमजे बीजेपी में इतने बड़े नेता नहीं हैं और न उनके इस्तीफा देने से पार्टी को कोई फर्क पड़े लेकिन विधानसभा चुनाव ने उनकी बलि ले ली । मोदी यह अच्छी तरह से समझते थे कि विधानसभा चुनाव में विपक्ष खासकर कांग्रेस इसे मुद्दा बनायेगी और वो सरकार के लिए असहज स्थिति होगी । ME TOO campaign में एमजे का नाम आने के बाद ही कांग्रेस ने उनके इस्तीफे की मांग की थी और पार्टी की ओर से सरकार पर लगातार दबाब बनाया जा रहा था । कांग्रेस इस इस्तीफे को अपनी जीत के तौर पर ले सकती है । बीजेपी के राजस्थान के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री निहाल चंद मेघवाल पर भी दुष्कर्म के आरोप लगे थे और सरकार पर विपक्ष का दवाब भी था लेकिन सरकार ने इस ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया । यह नैतिकता के आधार पर दिया इस्तीफा नहीं है । इस्तीफे में नैतिकता होती तो एमजे आरोप लगने के साथ ही दे देते लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया । विदेश से वापस आने के बाद भी वो ये कहते रहे कि अगले लोकसभा चुनाव को प्रभावित करने के लिए उन्हें निशाना बनाया गया है ।एमजे भूल गये कि सरकार और पार्टी में उनकी हैसियत ऐसी नहीं कि उन पर लगे आरोपों से चुनाव प्रभावित हो । अकबर के इस्तीफे के एक दिन पहले ही बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था कि उप पर लगे आरोपों की जांच होगी । उसी वक्त लग गया था कि अकबर को अब जाना होगा । एमजे का ये कहना भी गले नहीं उतरता कि उनकी छवि खराब करने के लिए आरोप लगाये जा रहे हैं । क्या बीस महिलायें अपनी इमेज पर दाग लगा किसी एक पर ऐसे आरोप लगा देंगी? नहीं ऐसा नहीं हो सकता । पिछले 8 अक्तूबर को प्रिया रमानी ने अकबर पर यौन शोषण के आरोप लगाये थे। उसके बाद तो वो महिलाये भी मुखर हो गईं जो उनकी हवस का शिकार हुई थीं । देखते देखते ये संख्या बीस पहुंच गई । सरकार में महिला मंत्री मेनका गांधी और स्मृति ईरानी भी एमजे अकबर के खिलाफ थी । मेनका ये तो यहां तक कहा था कि किसी पर भी महिला की ओर से लगाये गये आरोपों पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं है । अकबर का मामला अदालत में है। उन्होंने प्रिया रमानी पर मानहानि का दावा किया है । यह भी सही है कि फैसला अकबर के पक्ष में भी आ सकता है क्योंकि आरोपों को सिद्ध करना , वह भी इतने वर्षों बाद ,आसान नहीं है। लेकिन सवाल यह उठता है कि अकबर ही क्योंं? बीस महिलाएं एक ही बात कह रही हैं , क्या यह बात अदालत से ऊपर की नहीं है? वैसे भी , 80 ,90 और पिछले दशक में जिन पुरुष पत्रकारों ने अकबर के संस्थान में काम किया है ,वह उनकी इस कमज़ोरी के बारे में चर्चा करते थे।

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