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HUMOUR : बतर्ज़ श्रीलाल शुक्ल की राग दरबारीमुख्य खबरें
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HUMOUR : बतर्ज़ श्रीलाल शुक्ल की राग दरबारी
हिंदी साहित्य में व्यंग की विधा को स्वस्थ रखने में शरद जोशी और हरिशंकर परसाई जैसे बड़े नाम रहे हैं। इनके बीच एक नाम ऐसा भी था जिसने अपनी बेजोड़ उपन्यास राग दरबारी में समकालीन राजनीतिक दांव पेंच , ग्रामीण परिवेश के निहित स्वार्थ , स्थानीय जाति समीकरणों के चलते सरकारी तंत्र के दुरुपयोग का जो सजीव चित्रण किया उसकी मिसाल कम ही मिलती है। आज जब साहित्य अकादमी से पुरुस्कृत इस उपन्यास ने अपने प्रकाशन के 60 वर्ष पूरे कर लिए हैं , यह उल्लेख करना ज़रूरी होगा कि लेखक श्रीलाल शुक्ल ने इसमें जो व्यंग अथवा HUMOUR का इस्तेमाल किया है उसकी वजह से इसे जितनी बार पढ़ा जाये कम है। रोज़मर्रा की जिंदगी में HUMOUR किस कदर फैला हुआ है और हम उस पर ध्यान नहीं दे पाते हैं , इसे दर्शाकर श्रीलाल शुक्ल ने साहित्य को अद्भुत शैली दी है। हमारे जीवन में कितना व्यंग हो सकता है इसकी बानगी देते हैं हम यहाँ कुछ ऐसे वाक्यों के ज़रिये जो राग दरबारी से ही लिए गए हैं। पुस्तक के पहले पन्ने पर ही सड़क पर खड़ी ट्रक का विवरण कितनी मज़ाकिया लहज़े में किया गया है ज़रा सुनिए '' जैसे कि सत्य के होते हैं , इस ट्रक के भी कई पहलू थे। पुलिस वाले कह सकते थे कि वह सड़क के बीच में खड़ा है दूसरी ओर ड्राइवर कह सकता था कि वह सड़क के किनारे है।'' भंग पीने वालों में भंग पीसना एक कला है , कविता है ,कार्रवाई है ,करतब है ,रस्म है। उपन्यास का एक चरित्र था बेला जिसके है "'बेला बड़ों की आज्ञा मानती थी और दरवाज़े से बाहर नहीं निकलती थी , उसे बाहर जाना होता तो छत के रास्ते , मिली हुई छतों को पार करती हुई किसी पडोसी के मकान तक पहुँच जाती थी। ऐसे ही एक स्थान है बेला के बालों में जो तेल लगा था उसमे न खुशबू थी , न बदबू बल्कि सिर्फ बू थी। गांव के माहौल का वर्णन देखिये - अचनाक शोर होता है कि चल गयी , चल गयी जिसका मतलब था लाठी चल गयी। अदालत में मुकदमों की स्थिति को कितने विनोदपूर्ण तरीके से कहा गया है कि देश की सिविल अदालतों के कारण ही पुनर्जन्म सिद्धांत में विश्वास होता है। लोगों को मालूम है कि उनके मुक़दमे की सुनवाई इस जन्म में न सही अगले जन्म में हो जाएगी। और ये सुनिए -थाने में बैठे इंचार्ज के बैठने की स्टाइल पर एक वाक्य है कि किसी पुरातनकाल के सम्राट का सिंघासन था जो घिस कर दरोगाजी की कुर्सी बन गया था जिस पर वो बैठे भी थे और लेटे भी थे। इसी उपन्यास में रुप्पन बाबू के नाम से प्रसिद्ध एक आवारा किस्म के छात्र का चरित्र भी दिलचस्प बन गया और उनके स्टूडेंट्स के स्थान पर इश्टुडेन्ट कहना तो गज़ब। सच है। 60 वर्षों बाद भी राग दरबारी उपन्यास का कथानक उतना ही ताज़ा है जितना 1968 में रहा होगा। और भाषा शैली का तो जवाब ही नहीं जो इसमें लिखित तमाम वाक्य आज भी लोगों को ज़ुबानी याद हैं।
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