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विशेष रिपोर्ट : बड़े दल ,बड़े झंझट

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विशेष रिपोर्ट : बड़े दल ,बड़े झंझट

भारतीय राजनीति में मुख्यमंत्री पद के लिए घमासान कोई नयी बात नहीं है। छत्तीसगढ़ , मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस के अंदर जो कुछ भी हुआ वह होता ही रहता है लेकिन ध्यान दीजिये कि यह सब राष्ट्रीय दलों के साथ ही होता रहा है , क्षेत्रीय दल इस उहापोह से लगभग अछूते ही रहे हैं। अब याद करें - क्या उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की सरकार बनने पर मायावती के नाम पर कोई विवाद हुआ ? सवाल ही नहीं उठता है। इसी तरह समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव के बाद अखिलेश यादव भी आराम से मुख्यमंत्री हो गए। पिछले दिनों तेलंगाना में के. चंद्रशेखर राव के नाम पर कोई असहमति थी - नहीं न। तमिलनाडु में DMK की सरकार में करूणानिधि , AIADMK में जयललिता , पश्चिम बंगाल में TMC के सरकार में ममता बनर्जी। इससे पहले भी शिवसेना या सी.पी.एम. के सरकारों में इस तरह के कोई विवाद उठने ही नहीं दिए गए या उठाये ही नहीं किसी ने। इसका मतलब यह हुआ कि क्षेत्रीय राजनीतिक दलों में लीडरशिप का मुद्दा साफ़ और विवादरहित रहा। अब आते हैं इन बड़े राष्ट्रीय दलों पर जिसमे भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस ही हैं इस समय। याद कीजिये पिछले साल भाजपा की सरकार बनने पर उत्तर प्रदेश में कई दिन लग गए थे। मनोज सिन्हा का नाम फाइनल होते होते योगी आदित्यनाथ बाज़ी मार गए थे और पार्टी को दो उपमुख्यमंत्री भी बनाने पड़ गए थे। यही हाल हरियाणा का रहा था जहाँ अनिल विज और अन्य नाम पर चर्चा होती रही लेकिन खट्टर को मुख्यमंत्री बनाया गया। इसका अर्थ था कि UP और हरियाणा में राह आसान नहीं थी पार्टी के लिए। गुजरात में भी कमोबेश यही स्थिति रही थी। हाँ ! मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की पिछली सरकार में शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह के नाम आसानी से तय हो गए थे लेकिन वहां सरकारें रिपीट हो रही थीं और विवाद की कोई गुंजाईश नहीं थी। अब इस बार मध्य प्रदेश में कांग्रेस 15 वर्षों बाद आ रही है , ज़ाहिर है इतने सालों का वनवास झेलने के बाद वरिष्ठ नेता CM की कुर्सी चाहेंगे। यही स्थिति छत्तीसगढ़ में भी है जहाँ तीन अधिक नाम चर्चा में रहे CM पद के लिए। राजस्थान में ज़रूर सचिन पायलट की उम्मीदवारी मज़बूत मानी जा रही थी क्योंकि वह प्रदेश अध्यक्ष थे और उन्ही की अगुआई में पार्टी ने भाजपा को उखाड़ फेंका। इस बार गुरूवार के दिन तो कमाल ही हो गया जब छत्तीसगढ़ में एक CM पद के एक दावेदार के घर पर ही कार्यकर्ताओं में आपस में मारपीट हो गयी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद प्रमोद तिवारी का कहना है कि यह विवाद नहीं है बल्कि पार्टी में अंदरूनी प्रजातंत्र की मज़बूती है जहाँ सबकी राय लेकर निर्णय लिया जाता है। बहरहाल , अब भाजपा और कांग्रेस चाहे इसे INTERNAL डेमोक्रेसी कहें अथवा मतभेद। जनता तमाशा देख रही है , पहले भी देखा और आगे भी देखेगी। हाँ , इस एक मामले में छोटे और राजस्तरीय दल यह दावा कर सकते हैं कि नेताओं के चयन में उनकी प्रकिया सहज है। अब हो भी क्यों न ? ऐसी पार्टियों में होते भी तो हैं एक दो ही नेता।

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