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Special: Ballistic Missile (बैलिस्टिक मिसाइल)

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Special: Ballistic Missile (बैलिस्टिक मिसाइल)

तकनीकी दृष्टि से बैलिस्टिक मिसाइल उस मिसाइल को कहते हैं जिसका प्रक्षेपण पथ सब-आर्बिटल बैलिस्टिक पथ होता है। इसका उपयोग किसी हथियार को किसी पूर्वनिर्धारित लक्ष्य पर दागने के लिये किया जाता है। यह मिसाइल अपने प्रक्षेपण के प्रारम्भिक चरण में ही केवल गाइड की जाती है; उसके बाद का पथ कक्षीय यांत्रिकी या आर्बिटल मेकैनिक्स के सिद्धान्तों एवं बैलिस्टिक्स के सिद्धान्तों से निर्धारित होता है। अगर सरल शब्दों में कहे तो जब किसी प्रक्षेपास्त्र के साथ दिशा बताने वाला यंत्र लगा दिया जाता है तो वह हथियार बैलिस्टिक मिसाइल बन जाता है। इस मिसाइल को जब किसी स्थान से छोड़ा जाता है तो यह बहुत तेज़ी से पहले ऊपर की दिशा की ओर जाती है और फिर गुरुत्वाकर्षण से प्रभावित होकर बहुत तेज़ी से नीचे आती हुए अपने निर्धारित लक्ष्य को भेद देती है। इस मिसाइल के इस तरह से जाने-आने की प्रक्रिया के कारण ही इसे बैलिस्टिक मिसाइल कहा जाता है । इस की मारक क्षमता 5000 किलोमीटर से लेकर 10000 किलोमीटर तक होती है । इसमें जो दिशा यंत्र लगा होता है उसके कारण यह अपने प्रक्षेपण के शुरुआत में ही गाइड कर दी जाती है। उसके बाद जैसे यह ऊपर जाती है तो इसका निर्देश पाठ आर्बिटल मेकैनिक्स के सिद्धांतों और बैलिस्टिक्स के सिद्धांतों से निश्चित कर दिया जाता है। वर्तमान समय में बैलिस्टिक मिसाइल को रासायनिक रॉकेट इंजिन के द्वारा प्रोपेल किया जाता है। इन मिसाइलों में बहुत बड़ी मात्रा में विस्फोटकों को ले जाने की क्षमता होती है। भारत के पास बैलिस्टिक मिसाइल के रूप में पृथ्वी, अग्नि, और धनुष मिसाइलें हैं। इसमें कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल है • पृथ्वी 2 • पृथ्वी 3 • प्रहार मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल • अग्नि-1 - • अग्नि-2 – • इंटरमीडिएट दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल • अग्नि-3 – • अग्नि-4 - अन्तरमहाद्वीपीय दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल • अग्नि-5 -, • अग्नि-6 , • सूर्या • पनडुब्बी प्रक्षेपित बैलिस्टिक मिसाइल • के-15 सागारिका – • के-४ एसएलबीएम • के-5 एसएलबीएम सबसे पहला बैलिस्टिक मिसाइल A-4 था जिसे सामान्यतः V-2 रोकेट के नाम से जाना जाता है। इस प्रक्षेपास्त्र को नाज़ी जर्मनी ने 1930 से 1940 के मध्य में रोकेट साइंटिस्ट वेर्न्हेर वॉन ब्राउन की देखरेख में विकसित किया था। V-2 रोकेट का पहला सफल परिक्षण 3 अक्टूबर 1942 को हुआ, इसका 6 सितम्बर 1944 को फ़्रांस के विरुद्ध और उसके दो दिन बाद लन्दन पर इसका प्रयोग किया गया। द्वितीय विश्व युद्ध के अंत तक इस V-2 रोकेट प्रक्षेपास्त्र को 3,000 से भी ज्यादा बार प्रयोग में लाया गया था।

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