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Chunav Spl: फूलपुर किसके लिए रहेगा Foolproof

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Chunav Spl: फूलपुर किसके लिए रहेगा Foolproof

फूलपुर लोकसभा सीट यूपी के 80 लोकसभा सीटों में से एक हैं. ये इलाहाबाद जिले में स्थित है. लेकिन इसका अतीत और वर्तमान काफी दिलचस्प है. कभी देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू इस सीट का प्रतिनिधित्व करते थे| उनके चुनाव लड़ने के कारण ही इस सीट को 'VVIP सीट' का दर्जा मिला था। फूलपुर लोकसभा सीट के अंतर्गत विधानसभा की पांच सीटें आती हैं – इनमें फूलपुर, सोरांव, फाफामऊ, इलाहाबाद उत्तरी और इलाहाबाद पश्चिमी सीट शामिल हैं. इनमें से सोरांव सीट पर अपना दल का कब्जा हैं और बाकी चार सीटें बीजेपी के पास है. इस सीट से कुल १४ उम्मीदवार चुनावी मैदान में है| इनमे- केशरी देवी पटेल- बीजेपी, पंधारी यादव- समाजवादी पार्टी, पंकज पटेल- इंडियन नेशनल कांग्रेस, अतुल कुमार दिवेदी- लोक गठबंधन पार्टी, कमला प्रसाद- आंबेडकर युग पार्टी, दक्खिनी प्रसाद कुशवाहा- रास्ट्रीय गरीब दल, प्रिय सिंह पॉल अलियास प्रियदर्शिनी गाँधी- प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया, रामनाथ प्रियदर्शी सुमन- रास्ट्रीय जनमत पार्टी,डॉ.रामलखन चौरसिया- मौइक अधिकार पार्टी, श्रीचंद्र केसरवानी- बलिराजा पार्टी, सुनील कुमार मौर्य- प्रगतिशील समाज पार्टी, संजीव कुमार मिश्रा- युवा विकास पार्टी और निर्दलीय से रिषभ पाण्डेय और डॉ.नीरज मैदान में है| अगर समीकरण की बात करे तो फूलपुर की कुल जनसंख्या 25,27,766 है| इसमें ६४.४४% ग्रामीण, ३५.५६% शहरी है| कुल मतदाताओं की संख्या 19,13,274 है| इनमे 10,63,897 पुरुष और 8,49,377 महिला मतदाता है| फूलपुर में जातीय समीकरण काफी दिलचस्प है. इस संसदीय क्षेत्र में सबसे ज्यादा पटेल मतदाता हैं, जिनकी संख्या करीब सवा दो लाख है. मुस्लिम, यादव और कायस्थ मतदाताओं की संख्या भी इसी के आसपास है. लगभग डेढ़ लाख ब्राह्मण और एक लाख से अधिक अनुसूचित जाति के मतदाता हैं. अब एक नजर इस सीट के इतिहास पर- पंडित जवाहरलाल नेहरू ने आजादी के बाद पहली बार 1952 में हुए लोकसभा चुनाव में फूलपुर संसदीय सीट को अपनी कर्मभूमि के लिए चुना और वह लगातार 1952, 1957 और 1962 में यहां से सांसद निर्वाचित हुए. नेहरू के धुर-विरोधी रहे समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया 1962 में फूलपुर लोकसभा सीट से उनके सामने चुनावी मैदान में उतरे, लेकिन वो जीत नहीं सके. नेहरू के देहांत के बाद उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित 1964-1967 तक यहां से सांसद रहीं. 1969 में उपचुनाव में समायुक्त सोशलिस्ट पार्टी से जनेश्वर मिश्रा ने कांग्रेस का विजय रथ रोका. 1984 से 1991 तक रामपूजन पटेल ने हैट्रिक मारी एक बार कांग्रेस से, तो दो बार जनता दल से जीत हासिल की थी. अब तक सिर्फ दो ही ऐसे नेता हैं जो इस सीट से हैट-ट्रिक बना पाए हैं. पहले जवाहरलाल नेहरू और दूसरे हैं रामपूजन पटेल जो 1984, 1989 और 1991 में इस सीट से सांसद रहे. इसके बाद 1996 से 2004 तक SP ने इस सीट पर अपना कब्ज़ा बनाए रखा. साल 2009 में पहली बार इस सीट पर बहुजन समाज पार्टी ने भी जीत हासिल की, खास बात ये रही कि 2009 तक तमाम कोशिशों और समीकरणों के बावजूद भारतीय जनता पार्टी इस सीट पर जीत हासिल करने में नाकाम रही लेकिन साल 2014 में सारे समीकरण उलट गए और मोदी लहर में भाजपा नेता केशव मौर्य ने यहां ऐतिहासिक जीत दर्ज की। मौर्य ने बीएसपी नेता कपिलमुनि करवरिया को तीन लाख से भी ज़्यादा वोटों से हराया लेकिन 2018 में हुए उपचुनाव में यहां से समाजवादी पार्टी के नागेंद्र पटेल ने भाजपा नेता कौशलेंद्र पटेल को 59,613 मतों से शिकस्त दी । हालांकि देश की वीवीआईपी सीट होने के बावजूद फूलपुर में विकास के नाम पर सिर्फ़ इफ़को की यूरिया फ़ैक्ट्री है और शिक्षा के नाम पर यहां के कुछेक इंटर कॉलेज गुणवत्ता के लिए राज्य भर में काफी मशहूर रहे हैं लेकिन उनकी भी स्थिति दिनोंदिन बिगड़ती जा रही है, दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि यहां विकास की गति बहुत धीमी है। इस बार कांग्रेस ने पंकज निरंजन, बीजेपी ने केशरी देवी पटेल, सपा-बसपा गठबंधन ने पंधारी यादव को उतारा है। बीजेपी ने केशरी देवी पर दांव लगाकर फूलपुर में जातीय समीकरण साधने की कोशिश की है. इस बार का मुख्य मुकाबला इन्ही तीनों के बीच है। जिसमे हर प्रत्याशी जीत का दावा कर रहा है। इस लोकसभा चुनाव में बीजेपी जहां उपचुनाव में मिली हार का बदला लेने की कोशिश करेगी वहीं गठबंधन सीट बचाने के लिए जी-जान से जुटा है। कांग्रेस ने भी अपने पुराने गढ़ पर कब्जा पाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी है। अब देखना यह दिलचस्प होगा की कौन सी पार्टी फूलपुर की जनता के दिल में अपना जगह बना पाएगी| इसका जवाब तो हमें 23 मई को होने वाले चुनावी नतीजे ही देंगे|

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