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Marathwada- 4 साल से सूखे की चपेट में, सियासत जारी

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Marathwada- 4 साल से सूखे की चपेट में, सियासत जारी

उन्होंने राज्य सरकार और केंद्र सरकार से सूखा ग्रस्त इलाकों के किसानों की मदद करने की गुजारिश की , और चेताया कि अगर सरकार किसानों की मदद नहीं करती है तो आने वाले दिनों में गोदावरी नदी में किसान जल समाधि देंगे। महेश साखरे नाम के किसान ने बताया कि पिछले 3 सालों से इस गांव में सूखा पड़ा हुआ है और गांव के लोग खेती पर ही निर्भर है। लेकिन बारिश नहीं होने के कारण किसानों की फसल जल गई है जो किसानों ने फसल बीमा करवाया था उसमें भी 10% रहम किसानों के अकाउंट में आई है फिलहाल किसानों पर आत्महत्या करने की परिस्थिति आ गई है। इसी बीच करीब चार साल से भीषण सूखे की मार झेल रहे महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में दिग्गजों के वारिस अपनी-अपनी सियासत चमकाने में लगे हैं। यह लोकसभा चुनाव उनके लिए अपना वर्चस्व सिद्ध करने का अवसर बन गया है। जबकि, मराठवाड़ा के लोग इस क्षेत्र के आठों सांसदों से एक ही चीज चाहते हैं-पानी। इसका इंतजाम हो गया, तो सब समस्याएं अपने आप सुलझ जाएंगी। कभी हैदराबाद के निजाम की रियासत का एक भाग रहा मराठवाड़ा 1960 में महाराष्ट्र बनने के समय इस सूबे का हिस्सा बना। नांदेड़ से शंकरराव चह्वाण इस क्षेत्र के बड़े नेता रहे। उनके बाद कांग्रेस से विलासराव देशमुख और भाजपा से गोपीनाथ मुंडे उभरकर आए। कुछ ही वर्षों के अंतराल में इन दोनों नेताओं के असामयिक अवसान ने मराठवाड़ा का जैसे नूर ही उड़ा दिया है। अशोक चह्वाण के अलावा अब देशमुख, मुंडे और राज्य के एक और मुख्यमंत्री रहे शिवाजीराव निलंगेकर की अगली पीढ़ी मराठवाड़ा की सियासत में अपना वर्चस्व साबित करने की होड़ में लगी है। विलासराव के विधायक पुत्र अमित देशमुख और जिला परिषद सदस्य धीरज देशमुख, गोपीनाथ मुंडे की दो पुत्रियां पंकजा मुंडे और प्रीतम मुंडे तथा भतीजे धनंजय मुंडे, शिवाजीराव पाटिल निलंगेकर के पौत्र संभाजी पाटिल निलंगेकर पूरी ताकत से मोर्चा संभाल चुके हैं। अमित और धीरज कांग्रेस में रहते हुए अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। इसी क्षेत्र के संभाजी पाटिल निलंगेकर करीब एक दशक पहले ही अपने दादा शिवाजीराव पाटिल निलंगेकर की पार्टी कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थाम चुके हैं। उनका क्षेत्र लातूर अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित हो गया है। इलाके और निवासियों की समस्या से अच्छी तरह अवगत होने के बाद भी इनमे से किसी ने अब तक लोंगो के हित और मदद में ठोंस कदम नहीं उठाया . आज नौबत से है कि महिलाओं को गृहस्ती के लिए, बच्चों और पशुओं के पीने के लिए और किसानों के पास अपनी फसल मात्र के लिए भी पानी नहीं है. मराठवाड़ा में तपती धूप और पानी के अभाव से जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है. गोदावरी नदी सूख गई है. सूखी हुई नदी में पानी के लिए मछलियां तड़प रही हैं, जो अकाल का प्रतीक है. हालात ये हैं कि ये सूखा महाराष्ट्र के मराठवाड़ा, यवतमाल, नौगांव, औरंगाबाद, अमरावती और नासिक जैसे क्षेत्रों में रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रहा है. इस इलाको के लगभग 90 गांव के किसान खेतो की सिंचाई करने के लिए इसी नदी के पानी इस्तेमाल करते हैं, लेकिन पिछले 2 महीने से इस नदी में पानी नहीं होने से यहां के हजारों किसान बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं. फिलहाल राज्य सरकार द्वारा सूखा प्रभावित क्षेत्रों में पेयजल की आपूर्ति की सुविधा के लिए केंद्र सरकार से अतिरिक्त 300 करोड़ रुपये लेने की उम्मीद जताई जा रही है. मई के पहले सप्ताह में राज्य को सहायता देने के लिए केंद्र द्वारा 2,160 करोड़ रुपये की राहत राशि वितरित की गई थी. सरकार ने हालांकि इस साल बजट में इस गांव के लिए ज्यादा पैसे का इंतजाम किया है, लेकिन करीब 2,700 की आबादी वाले इस गांव की मांग है कि सरकारी वादे बहुत हुए अब पानी की समस्या का समाधान हर हाल में चाहिए।

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