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Special : कौन थे विद्यासागर, जिनकी मूर्ति पर है बवाल

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Special : कौन थे विद्यासागर, जिनकी मूर्ति पर है बवाल

यह बात उन्होंने बनारस संस्कृत कॉलेज के प्रिंसिपल जेआर बैलेंटाइन द्वारा संस्कृत पांडित्य-परंपरा की अंधाधुंध प्रशंसा से चिढ़ कर कही थी. एक बार, जब उन्हें सलाह दी गयी कि काशी-विश्वनाथ की तीर्थयात्रा कर लें, तो उनका जबाव था कि मेरे लिए मेरे पिता ही विश्वनाथ हैं और मां साक्षात देवी अन्नपूर्णा. विद्यासागर ने अपना अंत समय किसी तीर्थ-नगरी में नहीं, करमातर के संथालों की सेवा में बिताया. सहज बुद्धि, तर्क और विवेक पर निरंतर बल देने वाले, यूरोपीय और पारंपरिक दोनों तरह के ज्ञान में गहरा दखल रखने वाले, अपने ज्ञान को समाज-हित में बरतने वाले, निंदा-प्रशंसा की परवाह किये बिना समाज को अधिक मानवीय बनाने की आजीवन तपस्या करने वाले इंसान थे वो. देशप्रेम का अर्थ होता है देशवासियों से प्रेम — इस बात को जीवन में उतारने वाले ईश्वरचंद्र विद्यासागर सच में अनोखे इंसान थे. टैगोर के अनुसार, करोड़ों में एक इंसान. वे एक अत्यंत सम्मानित, लेकिन गरीब ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे. कड़ी मेहनत से पारंपरिक और आधुनिक, दोनों तरह की शिक्षा हासिल की. संस्कृत कॉलेज कोलकाता के प्रिंसिपल बने. अपनी विद्वता और प्रशासन-क्षमता का, साथ ही स्वतंत्र सोच-विचार का लोहा मनवाया. रिटायरमेंट के बाद हाईकोर्ट के जज का यह अनुरोध ठुकरा दिया कि अब वकालत करने लगें, क्योंकि उनके जैसा हिन्दू धर्मशास्त्र (कानून) का जानकार मिलना मुश्किल है. यह बहुत विचारोत्तेजक बात है कि शुरुआत में विद्यासागर समाज-सुधार के लिए शास्त्रों की अपील पर भरोसा करने की बजाय सहज बुद्धि और तर्क-विवेक पर भरोसा करना चाहते थे. 1851 में उन्होंने बाल-विवाह के विरुद्ध निबंध लिखा, ‘बाल-विवाह के दोष’. बाल-विवाह के दोष’ के पांच ही साल बाद, विधवा-विवाह और लड़कियों की शिक्षा के पक्ष में जनमत बनाने के लिए विद्यासागर ने शास्त्रों का सहारा लिया, खासकर पराशर स्मृति का. फिर भी विवेक और अनुभव पर उनका जोर बना ही रहा. वे शास्‍त्रों का उपयोग समाज को अधिक मानवीय बनाने के लिए कर रहे थे, अतीत के अंधाधुंध महिमामंडन के लिए नहीं. विद्यासागर ने औरतों की हालत सुधारने के लिए, उन्हें बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए, सोशल एक्टिविस्ट की भी भूमिका भी निभाई. जरूरी कानून बनें, उन पर अमल हो, इसके लिए काम किया. विरोध का मुकाबिला करते हए अपनी पहलकदमी पर विधवा-विवाह कराए, कई विधवाओं के मां-बाप दोनों की भूमिका निभाई. वे जो थोड़े से आत्मकथात्मक नोट्स छोड़ गये हैं, उनसे मालूम होता है कि उनके मन में न केवल अपनी मां के प्रति, बल्कि रायमणि देवी के प्रति भी कितनी गहरी कृतज्ञता थीं, जिनके घर में विद्यासागर कई बरस रहे. उन्होंने बांग्‍ला भाषा के शिष्ट और साधारण रूपों का भेद मिटाने की भी कोशिश की, अपने लेखन के जरिए भी और लेखकों को प्रोत्साहित करके भी. ‘वर्ण-परिचय’ नामक पुस्तक में राखाल-गोपाल की जोड़ी के जरिए उन्होंने बच्चों को केवल भाषा का ही नहीं, अच्छे-बुरे का भी बोध दिया. विद्यासागर सही मायने में समाज के नेता थे. सामाजिक सुधारों के साथ ही, सामाजिक विपदा के पलों में भी वे पीछे नहीं रहते थे. 1865 के अकाल के दौरान जो लंगर उन्होंने अपने गांव में चलाया, वह साल भर तक चलता ही रहा. बर्दवान में फैली महामारी के दौरान सरकार से पहले ही विद्यासागरजी ने वॉलंटियर दल खड़ा करके महामारी की चपेट से लोगों को बचाया. उनका कर्ज केवल बंगाल पर नहीं, सारे भारत पर है.

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