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Special: क्या ये संशोधन ज़रूरी नहीं हैं?

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Special: क्या ये संशोधन ज़रूरी नहीं हैं?

जब हमारा संविधान लिखा गया था उस समय देश में शिक्षा और शिक्षित लोगों का अभाव था इसलिये चूनाव लड़ने के लिये कोई शैक्षिक योग्यता नहीं रखी गई थी मगर आज तो संशोधन हो सकता है। जैसे उस समय 5वीं कक्षा पढ़ा व्यक्ति अध्यापक बन जाता था और आज उस पद के लिये TGT,BSC. B.ED,JBT , NET , SET जैसी योग्यता चाहिए, तो फिर राजनेता के लिये भी ऐसी योग्यता निर्धारित होनी चाहिए। क्या भारत का सिस्टम आम जनता को धोखा देता है ...? आप खुद देखिये.... 1.नेता चाहे तो दो सीट से एक साथ चुनाव लड़ सकता है ! लेकिन.... आप दो जगहों पर वोट नहीं डाल सकते-1996 में जन प्रतिनिधित्व कानून में यह अधिकार दिया गया है कि कोई व्यक्ति लोकसभा चुनाव, विधानसभा चुनाव या फिर उप चुनाव में एक साथ दो सीटों पर अपनी किस्मत आजमा सकता है। इससे पहले यानी 1996 से पाहले उम्मीदवार दो से अधिक स्थानों से चुनाव लड़ सकते थे। अब तक देखने में यही आता रहा है कि बड़े दल और बड़े राजनीतिक चेहरे ही एक साथ दो सीटों से चुनाव लड़ते रहे हैं। इसकी बड़ी वजह असुरक्षा की भावना होती है। पिछले लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो सीटों से चुनाव लड़ा था। वही वर्त्तमान लोक सभा चुनाव में राहुल गांधी 2 सीटो से चुनाव lade है| वह अमेठी और वायनाड से चुनाव lade है| जिसका नतीजा आ चूका है| जिसमे राहुल अपने गृह क्षेत्र अमेठी में चुनाव हार गए है वही वायनाड में जीत गए है| राजनीतिक दल या उसके उम्मीदवार के लिये दो जगह से चुनाव लड़ना रणनीतिक रूप से सही हो सकता है लेकिन नीति एवं नियमों की दृष्टि से इसे किसी भी सूरत में जायज नहीं माना जा सकता है। दरअसल अगर कोई नेता दो जगहों से चुनाव लड़ता है और उसे दोनों जगहों पर जीत मिलती है तो उसे दोनों में से किसी एक सीट को चुनना होता है| और दूसरी सीट खाली होने पर फिर से उपचुनाव कराया जाता है इसमें इसमें चुना आयोग के साथ-साथ जनता देश के पैसे और समय दोनों की बर्बादी है| विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में इस तरह की कमजोरियों एवं विसंगतियों पर नियंत्रण करना जरूरी है क्योंकि चुनाव लोकतंत्र का प्राण है और लोकतंत्र की प्रणाली एक व्यक्ति, एक वोट और एक उम्मीदवार के कॉनसेप्ट पर चलती है.

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